श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.22

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यस्य भक्तिर्भगवति हरौ निःश्रेयसेश्‍वरे।

विक्रीडतोऽमृताम्भोधौ किं क्षुद्रैः खातकोदकैः॥ २२

yasya bhaktirbhagavati harau niḥśreyaseśvare|

vikrīḍato'mṛtāmbhodhau kiṃ kṣudraiḥ khātakodakaiḥ|| 22

अर्थ

जो परम कल्याणके स्वामी भगवान् श्रीहरिके चरणोंमें प्रेममय भक्तिभाव रखता है, उसे जगत‍्के भोगोंकी क्या आवश्यकता है। जो अमृतके समुद्रमें विहार कर रहा है, उसे क्षुद्र गड्ढोंके जलसे प्रयोजन ही क्या हो सकता है॥ २२॥✎ 532

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #532 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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