श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार योद्धाओंमें श्रेष्ठ महापराक्रमी देवराज इन्द्र और वृत्रासुर धर्मका तत्त्व जाननेकी अभिलाषासे एक-दूसरेके साथ बातचीत करते हुए आपसमें युद्ध करने लगे॥ २३॥
इति ब्रुवाणावन्योन्यं धर्मजिज्ञासया नृप।
युयुधाते महावीर्याविन्द्रवृत्रौ युधाम्पती॥ २३
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार योद्धाओंमें श्रेष्ठ महापराक्रमी देवराज इन्द्र और वृत्रासुर धर्मका तत्त्व जाननेकी अभिलाषासे एक-दूसरेके साथ बातचीत करते हुए आपसमें युद्ध करने लगे॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.12.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 763) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/12/23/