श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.13.21

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

स वाजिमेधेन यथोदितेन

वितायमानेन मरीचिमिश्रैः।

इष्ट्वाधियज्ञं पुरुषं पुराण-

मिन्द्रो महानास विधूतपापः॥ २१

sa vājimedhena yathoditena

vitāyamānena marīcimiśraiḥ|

iṣṭvādhiyajñaṃ puruṣaṃ purāṇa-

mindro mahānāsa vidhūtapāpaḥ|| 21

अर्थ

जब मरीचि आदि मुनीश्‍वरोंने उनसे विधिपूर्वक अश्‍वमेध यज्ञ कराया, तब उसके द्वारा सनातन पुरुष यज्ञपति भगवान्‌की आराधना करके इन्द्र सब पापोंसे छूट गये और पूर्ववत् फिर पूजनीय हो गये॥ २१॥✎ 534 535 536 537

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #534 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #535 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #536 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #537 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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