श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.13.22

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

इदं महाख्यानमशेषपाप्मनां

प्रक्षालनं तीर्थपदानुकीर्तनम्।

भक्त्युच्छ्रयं भक्तजनानुवर्णनं

महेन्द्रमोक्षं विजयं मरुत्वतः॥ २२

idaṃ mahākhyānamaśeṣapāpmanāṃ

prakṣālanaṃ tīrthapadānukīrtanam|

bhaktyucchrayaṃ bhaktajanānuvarṇanaṃ

mahendramokṣaṃ vijayaṃ marutvataḥ|| 22

अर्थ

परीक्षित्! इस श्रेष्ठ आख्यानमें इन्द्रकी विजय, उनकी पापोंसे मुक्ति और भगवान्‌के प्यारे भक्त वृत्रासुरका वर्णन हुआ है। इसमें तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाले भगवान्‌के अनुग्रह आदि गुणोंका संकीर्तन है। यह सारे पापोंको धो बहाता है और भक्तिको बढ़ाता है॥ २२॥

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