श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.13.4

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

वृत्रविक्रमसंविग्नाः सर्वे देवाः सहर्षिभिः।

तद्वधायार्थयन्‍निन्द्रं नैच्छद् भीतो बृहद्वधात्॥ ४

vṛtravikramasaṃvignāḥ sarve devāḥ saharṣibhiḥ|

tadvadhāyārthayannindraṃ naicchad bhīto bṛhadvadhāt|| 4

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! जब वृत्रासुरके पराक्रमसे सभी देवता और ऋषि-महर्षि अत्यन्त भयभीत हो गये, तब उन लोगोंने उसके वधके लिये इन्द्रसे प्रार्थना की; परन्तु वे ब्रह्महत्याके भयसे उसे मारना नहीं चाहते थे॥ ४॥

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