श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.13

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

न तस्य संपदः सर्वा महिष्यो वामलोचनाः।

सार्वभौमस्य भूश्चेयमभवन् प्रीतिहेतवः॥ १३

na tasya saṃpadaḥ sarvā mahiṣyo vāmalocanāḥ|

sārvabhaumasya bhūśceyamabhavan prītihetavaḥ|| 13

अर्थ

वे सारी पृथ्वीके एकछत्र सम्राट् थे, बहुत-सी सुन्दरी रानियाँ थीं तथा सारी पृथ्वी उनके वशमें थी। सब प्रकारकी सम्पत्तियाँ उनकी सेवामें उपस्थित थीं, परन्तु वे सब वस्तुएँ उन्हें सुखी न कर सकीं॥ १३॥

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