श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.12

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

रूपौदार्यवयोजन्मविद्यैश्‍वर्यश्रियादिभिः।

सम्पन्‍नस्य गुणैः सर्वैश्चिन्ता वन्ध्यापतेरभूत्॥ १२

rūpaudāryavayojanmavidyaiśvaryaśriyādibhiḥ|

sampannasya guṇaiḥ sarvaiścintā vandhyāpaterabhūt|| 12

अर्थ

यों महाराज चित्रकेतुको किसी बातकी कमी न थी। सुन्दरता, उदारता, युवावस्था, कुलीनता, विद्या, ऐश्‍वर्य और सम्पत्ति आदि सभी गुणोंसे वे सम्पन्‍न थे। फिर भी उनकी पत्नियाँ बाँझ थीं, इसलिये उन्हें बड़ी चिन्ता रहती थी॥ १२॥

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