श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.17

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अङ्गिरा उवाच

अपि तेऽनामयं स्वस्ति प्रकृतीनां तथाऽऽत्मनः।

यथा प्रकृतिभिर्गुप्तः पुमान् राजापि सप्तभिः॥ १७

api te'nāmayaṃ svasti prakṛtīnāṃ tathā''tmanaḥ|

yathā prakṛtibhirguptaḥ pumān rājāpi saptabhiḥ|| 17

अर्थ

अंगिरा ऋषिने कहा—राजन्! तुम अपनी प्रकृतियों—गुरु, मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, सेना और मित्रके साथ सकुशल तो हो न? जैसे जीव महत्तत्त्वादि सात आवरणोंसे घिरा रहता है, वैसे ही राजा भी इन सात प्रकृतियोंसे घिरा रहता है। उनके कुशलसे ही राजाकी कुशल है॥ १७॥

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