श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.27

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्यर्थितः स भगवान् कृपालुर्ब्रह्मणः सुतः।

श्रपयित्वा चरुं त्वाष्ट्रं त्वष्टारमयजद् विभुः॥ २७

ityarthitaḥ sa bhagavān kṛpālurbrahmaṇaḥ sutaḥ|

śrapayitvā caruṃ tvāṣṭraṃ tvaṣṭāramayajad vibhuḥ|| 27

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब राजा चित्रकेतुने इस प्रकार प्रार्थना की, तब सर्वसमर्थ एवं परम कृपालु ब्रह्मपुत्र भगवान् अंगिराने त्वष्टा देवताके योग्य चरु निर्माण करके उससे उनका यजन किया॥ २७॥

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