yathā tarema dustāraṃ prajayā tad vidhehi naḥ|| 26
अर्थ
महाभाग्यवान् महर्षे! मैं तो दुःखी हूँ ही, पिण्डदान न मिलनेकी आशंकासे मेरे पितर भी दुःखी हो रहे हैं। अब आप हमें सन्तान-दान करके परलोकमें प्राप्त होनेवाले घोर नरकसे उबारिये और ऐसी व्यवस्था कीजिये कि मैं लोक-परलोकके सब दुःखोंसे छुटकारा पा लूँ॥ २६॥
ततः पाहि महाभाग पूर्वैः सह गतं तमः।
यथा तरेम दुस्तारं प्रजया तद् विधेहि नः॥ २६
महाभाग्यवान् महर्षे! मैं तो दुःखी हूँ ही, पिण्डदान न मिलनेकी आशंकासे मेरे पितर भी दुःखी हो रहे हैं। अब आप हमें सन्तान-दान करके परलोकमें प्राप्त होनेवाले घोर नरकसे उबारिये और ऐसी व्यवस्था कीजिये कि मैं लोक-परलोकके सब दुःखोंसे छुटकारा पा लूँ॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 770) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/26/