श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.25

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

लोकपालैरपि प्रार्थ्याः साम्राज्यैश्‍वर्यसम्पदः।

न नन्दयन्त्यप्रजं मां क्षुत्तृट्काममिवापरे॥ २५

lokapālairapi prārthyāḥ sāmrājyaiśvaryasampadaḥ|

na nandayantyaprajaṃ māṃ kṣuttṛṭkāmamivāpare|| 25

अर्थ

मुझे पृथ्वीका साम्राज्य, ऐश्‍वर्य और सम्पत्तियाँ, जिनके लिये लोकपाल भी लालायित रहते हैं, प्राप्त हैं। परन्तु सन्तान न होनेके कारण मुझे इन सुखभोगोंसे उसी प्रकार तनिक भी शान्ति नहीं मिल रही है, जैसे भूखे-प्यासे प्राणीको अन्‍न-जलके सिवा दूसरे भोगोंसे॥ २५॥

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