ऐसा होनेपर भी जब आप सब कुछ जान-बूझकर मुझसे मेरे मनकी चिन्ता पूछ रहे हैं, तब मैं आपकी आज्ञा और प्रेरणासे अपनी चिन्ता आपके चरणोंमें निवेदन करता हूँ॥ २४॥
तथापि पृच्छतो ब्रूयां ब्रह्मन्नात्मनि चिन्तितम्।
भवतो विदुषश्चापि चोदितस्त्वदनुज्ञया॥ २४
ऐसा होनेपर भी जब आप सब कुछ जान-बूझकर मुझसे मेरे मनकी चिन्ता पूछ रहे हैं, तब मैं आपकी आज्ञा और प्रेरणासे अपनी चिन्ता आपके चरणोंमें निवेदन करता हूँ॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 770) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/24/