॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.14.23
चित्रकेतुरुवाच
भगवन् किं न विदितं तपोज्ञानसमाधिभिः।
योगिनां ध्वस्तपापानां बहिरन्तः शरीरिषु॥ २३
bhagavan kiṃ na viditaṃ tapojñānasamādhibhiḥ|
yogināṃ dhvastapāpānāṃ bahirantaḥ śarīriṣu|| 23
अर्थ
सम्राट् चित्रकेतुने कहा—भगवन्! जिन योगियोंके तपस्या, ज्ञान, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा सारे पाप नष्ट हो चुके हैं—उनके लिये प्राणियोंके बाहर या भीतरकी ऐसी कौन-सी बात है, जिसे वे न जानते हों॥ २३॥