श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.22

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

एवं विकल्पितो राजन् विदुषा मुनिनापि सः।

प्रश्रयावनतोऽभ्याह प्रजाकामस्ततो मुनिम्॥ २२

evaṃ vikalpito rājan viduṣā munināpi saḥ|

praśrayāvanato'bhyāha prajākāmastato munim|| 22

अर्थ

परीक्षित्! महर्षि अंगिरा यह जानते थे कि राजाके मनमें किस बातकी चिन्ता है। फिर भी उन्होंने उनसे चिन्ताके सम्बन्धमें अनेकों प्रश्न पूछे। चित्रकेतुको सन्तानकी कामना थी। अतः महर्षिके पूछनेपर उन्होंने विनयसे झुककर निवेदन किया॥ २२॥

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