श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.21

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

आत्मनः प्रीयते नात्मा परतः स्वत एव वा।

लक्षयेऽलब्धकामं त्वां चिन्तया शबलं मुखम्॥ २१

ātmanaḥ prīyate nātmā parataḥ svata eva vā|

lakṣaye'labdhakāmaṃ tvāṃ cintayā śabalaṃ mukham|| 21

अर्थ

परन्तु मैं देख रहा हूँ कि तुम स्वयं सन्तुष्ट नहीं हो। तुम्हारी कोई कामना अपूर्ण है। तुम्हारे मुँहपर किसी आन्तरिक चिन्ताके चिह्न झलक रहे हैं। तुम्हारे इस असन्तोषका कारण कोई और है या स्वयं तुम्हीं हो?॥ २१॥

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