उदारशिरोमणि राजा चित्रकेतुने पुत्रके धन, यश और आयुकी वृद्धिके लिये दूसरे लोगोंको भी मुँहमाँगी वस्तुएँ दीं—ठीक उसी प्रकार जैसे मेघ सभी जीवोंका मनोरथ पूर्ण करता है॥ ३५॥
ववर्ष काममन्येषां पर्जन्य इव देहिनाम्।
धन्यं यशस्यमायुष्यं कुमारस्य महामनाः॥ ३५
उदारशिरोमणि राजा चित्रकेतुने पुत्रके धन, यश और आयुकी वृद्धिके लिये दूसरे लोगोंको भी मुँहमाँगी वस्तुएँ दीं—ठीक उसी प्रकार जैसे मेघ सभी जीवोंका मनोरथ पूर्ण करता है॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 771) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/35/