श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.36

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कृच्छ्रलब्धेऽथ राजर्षेस्तनयेऽनुदिनं पितुः।

यथा निःस्वस्य कृच्छ्राप्ते धने स्नेहोऽन्ववर्धत॥ ३६

kṛcchralabdhe'tha rājarṣestanaye'nudinaṃ pituḥ|

yathā niḥsvasya kṛcchrāpte dhane sneho'nvavardhata|| 36

अर्थ

परीक्षित्! जैसे यदि किसी कंगालको बड़ी कठिनाईसे कुछ धन मिल जाता है तो उसमें उसकी आसक्ति हो जाती है, वैसे ही बहुत कठिनाईसे प्राप्त हुए उस पुत्रमें राजर्षि चित्रकेतुका स्नेहबन्धन दिनोंदिन दृढ़ होने लगा॥ ३६॥

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