माता कृतद्युतिको भी अपने पुत्रपर मोहके कारण बहुत ही स्नेह था। परन्तु उनकी सौत रानियोंके मनमें पुत्रकी कामनासे और भी जलन होने लगी॥ ३७॥
मातुस्त्वतितरां पुत्रे स्नेहो मोहसमुद्भवः।
कृतद्युतेः सपत्नीनां प्रजाकामज्वरोऽभवत्॥ ३७
माता कृतद्युतिको भी अपने पुत्रपर मोहके कारण बहुत ही स्नेह था। परन्तु उनकी सौत रानियोंके मनमें पुत्रकी कामनासे और भी जलन होने लगी॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 771) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/37/