॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.15.23
सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः।
गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः॥ २३
sarve'pi śūraseneme śokamohabhayārtidāḥ|
gandharvanagaraprakhyāḥ svapnamāyāmanorathāḥ|| 23
अर्थ
शूरसेन! अतएव ये सभी शोक, मोह, भय और दुःखके कारण हैं, मनके खेल-खिलौने हैं, सर्वथा कल्पित और मिथ्या हैं; क्योंकि ये न होनेपर भी दिखायी पड़ रहे हैं। यही कारण है कि ये एक क्षण दीखनेपर भी दूसरे क्षण लुप्त हो जाते हैं। ये गन्धर्वनगर, स्वप्न, जादू और मनोरथकी वस्तुओंके समान सर्वथा असत्य हैं। जो लोग कर्म-वासनाओंसे प्रेरित होकर विषयोंका चिन्तन करते रहते हैं; उन्हींका मन अनेक प्रकारके कर्मोंकी सृष्टि करता है॥ २३-२४॥✎ 1985