श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.15.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः।

द्वैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश॥ २६

tasmāt svasthena manasā vimṛśya gatimātmanaḥ|

dvaite dhruvārthaviśrambhaṃ tyajopaśamamāviśa|| 26

अर्थ

इसलिये तुम अपने मनको विषयोंमें भटकनेसे रोककर शान्त करो, स्वस्थ करो और फिर उस मनके द्वारा अपने वास्तविक स्वरूपका विचार करो तथा इस द्वैत-भ्रममें नित्यत्वकी बुद्धि छोड़कर परम शान्तिस्वरूप परमात्मामें स्थित हो जाओ॥ २६॥

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