श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.15.27

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

नारद उवाच

एतां मन्त्रोपनिषदं प्रतीच्छ प्रयतो मम।

यां धारयन् सप्तरात्राद् द्रष्टा सङ्कर्षणं प्रभुम्॥ २७

etāṃ mantropaniṣadaṃ pratīccha prayato mama|

yāṃ dhārayan saptarātrād draṣṭā saṅkarṣaṇaṃ prabhum|| 27

अर्थ

देवर्षि नारदने कहा—राजन्! तुम एकाग्रचित्तसे मुझसे यह मन्त्रोपनिषद् ग्रहण करो। इसे धारण करनेसे सात रातमें ही तुम्हें भगवान् संकर्षणका दर्शन होगा॥ २७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें