इसका न तो कोई अत्यन्त प्रिय है और न अप्रिय, न अपना और न पराया। क्योंकि गुण-दोष (हित-अहित) करनेवाले मित्र-शत्रु आदिकी भिन्न-भिन्न बुद्धि-वृत्तियोंका यह अकेला ही साक्षी है; वास्तवमें यह अद्वितीय है॥ १०॥
न ह्यस्यातिप्रियः कश्चिन्नाप्रियः स्वः परोऽपि वा।
एकः सर्वधियां द्रष्टा कर्तॄणां गुणदोषयोः॥ १०
इसका न तो कोई अत्यन्त प्रिय है और न अप्रिय, न अपना और न पराया। क्योंकि गुण-दोष (हित-अहित) करनेवाले मित्र-शत्रु आदिकी भिन्न-भिन्न बुद्धि-वृत्तियोंका यह अकेला ही साक्षी है; वास्तवमें यह अद्वितीय है॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 779) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1093 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कर्तृणां → कर्तॄणां