श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.9

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एष सर्वाश्रयः स्वदृक्।

आत्ममायागुणैर्विश्‍वमात्मानं सृजति प्रभुः॥ ९

eṣa nityo'vyayaḥ sūkṣma eṣa sarvāśrayaḥ svadṛk|

ātmamāyāguṇairviśvamātmānaṃ sṛjati prabhuḥ|| 9

अर्थ

यह जीव नित्य अविनाशी, सूक्ष्म (जन्मादिरहित), सबका आश्रय और स्वयंप्रकाश है। इसमें स्वरूपतः जन्म-मृत्यु आदि कुछ भी नहीं हैं। फिर भी यह ईश्‍वररूप होनेके कारण अपनी मायाके गुणोंसे ही अपने-आपको विश्‍वके रूपमें प्रकट कर देता है॥ ९॥

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