श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.8

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एवं योनिगतो जीवः स नित्यो निरहङ्कृतः।

यावद्यत्रोपलभ्येत तावत्स्वत्वं हि तस्य तत् ॥ ८

evaṃ yonigato jīvaḥ sa nityo nirahaṅkṛtaḥ|

yāvadyatropalabhyeta tāvatsvatvaṃ hi tasya tat || 8

अर्थ

जीव नित्य और अहंकाररहित है। वह गर्भमें आकर जबतक जिस शरीरमें रहता है, तभीतक उस शरीरको अपना समझता है॥ ८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें