॥ श्रीहरिः ॥
जीवात्मन् पश्य भद्रं ते मातरं पितरं च ते।
सुहृदो बान्धवास्तप्ताः शुचा त्वत्कृतया भृशम्॥ २
jīvātman paśya bhadraṃ te mātaraṃ pitaraṃ ca te|
suhṛdo bāndhavāstaptāḥ śucā tvatkṛtayā bhṛśam|| 2
अर्थ
देवर्षि नारदने कहा—जीवात्मन्! तुम्हारा कल्याण हो। देखो, तुम्हारे माता-पिता, सुहृद्-सम्बन्धी तुम्हारे वियोगसे अत्यन्त शोकाकुल हो रहे हैं॥ २॥
जीवात्मन् पश्य भद्रं ते मातरं पितरं च ते।
सुहृदो बान्धवास्तप्ताः शुचा त्वत्कृतया भृशम्॥ २
देवर्षि नारदने कहा—जीवात्मन्! तुम्हारा कल्याण हो। देखो, तुम्हारे माता-पिता, सुहृद्-सम्बन्धी तुम्हारे वियोगसे अत्यन्त शोकाकुल हो रहे हैं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 778) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/2/