भगवान् शेषका दर्शन करते ही राजर्षि चित्रकेतुके सारे पाप नष्ट हो गये। उनका अन्तःकरण स्वच्छ और निर्मल हो गया। हृदयमें भक्तिभावकी बाढ़ आ गयी। नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये। शरीरका एक-एक रोम खिल उठा। उन्होंने ऐसी ही स्थितिमें आदिपुरुष भगवान् शेषको नमस्कार किया॥ ३१॥✎ 542
तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः
स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुनिः।
प्रवृद्धभक्त्या प्रणयाश्रुलोचनः
प्रहृष्टरोमानमदादिपूरुषम् ॥ ३१
भगवान् शेषका दर्शन करते ही राजर्षि चित्रकेतुके सारे पाप नष्ट हो गये। उनका अन्तःकरण स्वच्छ और निर्मल हो गया। हृदयमें भक्तिभावकी बाढ़ आ गयी। नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये। शरीरका एक-एक रोम खिल उठा। उन्होंने ऐसी ही स्थितिमें आदिपुरुष भगवान् शेषको नमस्कार किया॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 782) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/31/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—मुहुः।
(मुद्रित पृष्ठ 782)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#542 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् की → शेषभगवान्की