उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू टप-टप गिरते जा रहे थे। इससे भगवान् शेषके चरण रखनेकी चौकी भीग गयी। प्रेमोद्रेकके कारण उनके मुँहसे एक अक्षर भी न निकल सका। वे बहुत देरतक शेषभगवान्की कुछ भी स्तुति न कर सके॥ ३२॥✎ 542
स उत्तमश्लोकपदाब्जविष्टरं
प्रेमाश्रुलेशैरुपमेहयन्मुहुः ।
प्रेमोपरुद्धाखिलवर्णनिर्गमो
नैवाशकत्तं प्रसमीडितुं चिरम्॥ ३२
उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू टप-टप गिरते जा रहे थे। इससे भगवान् शेषके चरण रखनेकी चौकी भीग गयी। प्रेमोद्रेकके कारण उनके मुँहसे एक अक्षर भी न निकल सका। वे बहुत देरतक शेषभगवान्की कुछ भी स्तुति न कर सके॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 782) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/32/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—सेवय०।
(मुद्रित पृष्ठ 782)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#542 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् की → शेषभगवान्की