श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.32

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

स उत्तमश्लोकपदाब्जविष्टरं

प्रेमाश्रुलेशैरुपमेह२यन्मुहुः ।

प्रेमोपरुद्धाखिलवर्णनिर्गमो

नैवाशकत्तं प्रसमीडितुं चिरम्॥ ३२

sa uttamaślokapadābjaviṣṭaraṃ

premāśruleśairupamehayanmuhuḥ |

premoparuddhākhilavarṇanirgamo

naivāśakattaṃ prasamīḍituṃ ciram|| 32

अर्थ

उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू टप-टप गिरते जा रहे थे। इससे भगवान् शेषके चरण रखनेकी चौकी भीग गयी। प्रेमोद्रेकके कारण उनके मुँहसे एक अक्षर भी न निकल सका। वे बहुत देरतक शेषभगवान्‌की कुछ भी स्तुति न कर सके॥ ३२॥✎ 542

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—सेवय०।

    (मुद्रित पृष्ठ 782)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #542 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् की → शेषभगवान्‌की

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