श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.33

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

ततः समाधाय मनो मनीषया

बभाष एतत्प्रतिलब्धवागसौ।

नियम्य सर्वेन्द्रियबाह्यवर्तनं

जगद‍्गुरुं सात्वतशास्त्रविग्रहम्॥ ३३

tataḥ samādhāya mano manīṣayā

babhāṣa etatpratilabdhavāgasau|

niyamya sarvendriyabāhyavartanaṃ

jagadguruṃ sātvataśāstravigraham|| 33

अर्थ

थोड़ी देर बाद उन्हें बोलनेकी कुछ-कुछ शक्ति प्राप्त हुई। उन्होंने विवेकबुद्धिसे मनको समाहित किया और सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी बाह्यवृत्तिको रोका। फिर उन जगद‍्गुरुकी, जिनके स्वरूपका पांचरात्र आदि भक्तिशास्त्रोंमें वर्णन किया गया है, इस प्रकार स्तुति की॥ ३३॥✎ 542

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #542 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् की → शेषभगवान्‌की

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