भगवन्! जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय आपके लीला-विलास हैं। विश्वनिर्माता ब्रह्मा आदि आपके अंशके भी अंश हैं। फिर भी वे पृथक्-पृथक् अपनेको जगत्कर्ता मानकर झूठमूठ एक-दूसरेसे स्पर्धा करते हैं॥ ३५॥
तव विभवः खलु भगवन्
जगदुदयस्थितिलयादीनि ।
विश्वसृजस्तेंऽशांशा-
स्तत्र मृषा स्पर्धन्ते पृथगभिमत्या॥ ३५
भगवन्! जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय आपके लीला-विलास हैं। विश्वनिर्माता ब्रह्मा आदि आपके अंशके भी अंश हैं। फिर भी वे पृथक्-पृथक् अपनेको जगत्कर्ता मानकर झूठमूठ एक-दूसरेसे स्पर्धा करते हैं॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 782) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/35/