श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.36

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

परमाणुपरममहतो-

स्त्वमाद्यन्तान्तरवर्ती त्रयविधुरः।

आदावन्तेऽपि च सत्त्वानां

यद् ध्रुवं तदेवान्तरालेऽपि॥ ३६

paramāṇuparamamahato-

stvamādyantāntaravartī trayavidhuraḥ|

ādāvante'pi ca sattvānāṃ

yad dhruvaṃ tadevāntarāle'pi|| 36

अर्थ

नन्हे-से-नन्हे परमाणुसे लेकर बड़े-से-बड़े महत्तत्त्वपर्यन्त सम्पूर्ण वस्तुओंके आदि, अन्त और मध्यमें आप ही विराजमान हैं तथा स्वयं आप आदि, अन्त और मध्यसे रहित हैं। क्योंकि किसी भी पदार्थके आदि और अन्तमें जो वस्तु रहती है, वही मध्यमें भी रहती है॥ ३६॥

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