श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.4

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

जीव उवाच

कस्मिञ्जन्मन्यमी मह्यं पितरो मातरोऽभवन्।

कर्मभिर्भ्राम्यमाणस्य देवतिर्यङ्नृयोनिषु॥ ४

kasmiñjanmanyamī mahyaṃ pitaro mātaro'bhavan|

karmabhirbhrāmyamāṇasya devatiryaṅnṛyoniṣu|| 4

अर्थ

जीवात्माने कहा—देवर्षिजी! मैं अपने कर्मोंके अनुसार देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियोंमें न जाने कितने जन्मोंसे भटक रहा हूँ। उनमेंसे ये लोग किस जन्ममें मेरे माता-पिता हुए?॥ ४॥

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