श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.45

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अथ भगवन् वयमधुना

त्वदवलोकपरिमृष्टाशयमलाः ।

सुरऋषिणा यदुदितं

ता२वकेन कथमन्यथा भवति॥ ४५

atha bhagavan vayamadhunā

tvadavalokaparimṛṣṭāśayamalāḥ |

suraṛṣiṇā yaduditaṃ

tāvakena kathamanyathā bhavati|| 45

अर्थ

भगवन्! इस समय आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे अन्तःकरणका सारा मल धुल गया है, सो ठीक ही है। क्योंकि आपके अनन्यप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजीने जो कुछ कहा है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है॥ ४५॥✎ 543

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—तत्केन।

    (मुद्रित पृष्ठ 784)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #543 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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