श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.46

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

विदितमनन्त समस्तं

तव जगदात्मनो जनैरिहाचरितम्।

विज्ञाप्यं परमगुरोः

कियदिव सवितुरिव खद्योतैः॥ ४६

viditamananta samastaṃ

tava jagadātmano janairihācaritam|

vijñāpyaṃ paramaguroḥ

kiyadiva savituriva khadyotaiḥ|| 46

अर्थ

हे अनन्त! आप सम्पूर्ण जगत‍्के आत्मा हैं। अतएव संसारमें प्राणी जो कुछ करते हैं, वह सब आप जानते ही रहते हैं। इसलिये जैसे जुगनू सूर्यको प्रकाशित नहीं कर सकता, वैसे ही परमगुरु आपसे मैं क्या निवेदन करूँ॥ ४६॥✎ 543

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #543 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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