जब जीव मेरे स्वरूपको भूल जाता है, तब वह अपनेको अलग मान बैठता है; इसीसे उसे संसारके चक्करमें पड़ना पड़ता है और जन्म-पर-जन्म तथा मृत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती है॥ ५७॥✎ 545
यदेतद्विस्मृतं पुंसो मद्भावं भिन्नमात्मनः।
ततः संसार एतस्य देहाद्देहो मृतेर्मृतिः॥ ५७
जब जीव मेरे स्वरूपको भूल जाता है, तब वह अपनेको अलग मान बैठता है; इसीसे उसे संसारके चक्करमें पड़ना पड़ता है और जन्म-पर-जन्म तथा मृत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती है॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 785) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/57/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने