श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.58

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

लब्ध्वेह मानुषीं योनिं ज्ञानविज्ञानसम्भवाम्।

आत्मानं यो न बुद्ध्येत न क्‍वचिच्छममाप्नुयात्॥ ५८

labdhveha mānuṣīṃ yoniṃ jñānavijñānasambhavām|

ātmānaṃ yo na buddhyeta na kvacicchamamāpnuyāt|| 58

अर्थ

यह मनुष्ययोनि ज्ञान और विज्ञानका मूल स्रोत है। जो इसे पाकर भी अपने आत्मस्वरूप परमात्माको नहीं जान लेता, उसे कहीं किसी भी योनिमें शान्ति नहीं मिल सकती॥ ५८॥✎ 545

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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