tato'nivṛttiraprāptirduḥkhasya ca sukhasya ca|| 60
अर्थ
जगत्के सभी स्त्री-पुरुष इसलिये कर्म करते हैं कि उन्हें सुख मिले और उनका दुःखोंसे पिण्ड छूटे; परन्तु उन कर्मोंसे न तो उनका दुःख दूर होता है और न उन्हें सुखकी ही प्राप्ति होती है॥ ६०॥
सुखाय दुःखमोक्षाय कुर्वाते दम्पती क्रियाः।
ततोऽनिवृत्तिरप्राप्तिर्दुःखस्य च सुखस्य च॥ ६०
जगत्के सभी स्त्री-पुरुष इसलिये कर्म करते हैं कि उन्हें सुख मिले और उनका दुःखोंसे पिण्ड छूटे; परन्तु उन कर्मोंसे न तो उनका दुःख दूर होता है और न उन्हें सुखकी ही प्राप्ति होती है॥ ६०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.60 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 786) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/60/