श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.61

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एवं विपर्ययं बुद‍्ध्वा नृणां विज्ञाभिमानिनाम्।

आत्मनश्‍च गतिं सूक्ष्मां स्थानत्रयविलक्षणाम्॥ ६१

evaṃ viparyayaṃ buddhvā nṛṇāṃ vijñābhimāninām|

ātmanaśca gatiṃ sūkṣmāṃ sthānatrayavilakṣaṇām|| 61

अर्थ

जो मनुष्य अपनेको बहुत बड़ा बुद्धिमान् मानकर कर्मके पचड़ोंमें पड़े हुए हैं, उनको विपरीत फल मिलता है—यह बात समझ लेनी चाहिये; साथ ही यह भी जान लेना चाहिये कि आत्माका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं तथा इनके अभिमानियोंसे विलक्षण है॥ ६१॥

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