यह जानकर इस लोकमें देखे और परलोकके सुने हुए विषय-भोगोंसे विवेकबुद्धिके द्वारा अपना पिण्ड छुड़ा ले और ज्ञान तथा विज्ञानमें ही सन्तुष्ट रहकर मेरा भक्त हो जाय॥ ६२॥
दृष्टश्रुताभिर्मात्राभिर्निर्मुक्तः स्वेन तेजसा।
ज्ञानविज्ञानसन्तुष्टो मद्भक्तः पुरुषो भवेत्॥ ६२
यह जानकर इस लोकमें देखे और परलोकके सुने हुए विषय-भोगोंसे विवेकबुद्धिके द्वारा अपना पिण्ड छुड़ा ले और ज्ञान तथा विज्ञानमें ही सन्तुष्ट रहकर मेरा भक्त हो जाय॥ ६२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.62 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 786) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/62/