श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.63

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एतावानेव मनुजैर्योगनैपुणबुद्धिभिः।

स्वार्थः सर्वात्मना ज्ञेयो यत्परात्मैकदर्शनम् ॥ ६३

etāvāneva manujairyoganaipuṇabuddhibhiḥ|

svārthaḥ sarvātmanā jñeyo yatparātmaikadarśanam || 63

अर्थ

जो लोग योगमार्गका तत्त्व समझनेमें निपुण हैं, उनको भलीभाँति समझ लेना चाहिये कि जीवका सबसे बड़ा स्वार्थ और परमार्थ केवल इतना ही है कि वह ब्रह्म और आत्माकी एकताका अनुभव कर ले॥ ६३॥

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