माताजी! सुख और दुःखको देनेवाला न तो अपना आत्मा है और न कोई दूसरा। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपनेको अथवा दूसरेको सुख-दुःखका कर्ता माना करते हैं॥ १९॥
नैवात्मा न परश्चापि कर्ता स्यात् सुखदुःखयोः।
कर्तारं मन्यतेऽप्राज्ञ आत्मानं परमेव च॥ १९
माताजी! सुख और दुःखको देनेवाला न तो अपना आत्मा है और न कोई दूसरा। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपनेको अथवा दूसरेको सुख-दुःखका कर्ता माना करते हैं॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 789) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/19/