श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.19

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

नैवात्मा न परश्चापि कर्ता स्यात् सुखदुःखयोः।

कर्तारं मन्यतेऽप्राज्ञ आत्मानं परमेव च॥ १९

naivātmā na paraścāpi kartā syāt sukhaduḥkhayoḥ|

kartāraṃ manyate'prājña ātmānaṃ parameva ca|| 19

अर्थ

माताजी! सुख और दुःखको देनेवाला न तो अपना आत्मा है और न कोई दूसरा। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपनेको अथवा दूसरेको सुख-दुःखका कर्ता माना करते हैं॥ १९॥

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