॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.17.23
तथापि तच्छक्तिविसर्ग एषां
सुखाय दुःखाय हिताहिताय।
बन्धाय मोक्षाय च मृत्युजन्मनोः
शरीरिणां संसृतयेऽवकल्पते॥ २३
tathāpi tacchaktivisarga eṣāṃ
sukhāya duḥkhāya hitāhitāya|
bandhāya mokṣāya ca mṛtyujanmanoḥ
śarīriṇāṃ saṃsṛtaye'vakalpate|| 23
अर्थ
तथापि उनकी मायाशक्तिके कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियोंके सुख-दुःख, हित-अहित, बन्ध-मोक्ष, मृत्यु-जन्म और आवागमनके कारण बनते हैं॥ २३॥