श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.24

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अथ प्रसादये न त्वां शापमोक्षाय भामिनि।

यन्मन्यसे असाधूक्तं मम तत्क्षम्यतां सति॥ २४

atha prasādaye na tvāṃ śāpamokṣāya bhāmini|

yanmanyase asādhūktaṃ mama tatkṣamyatāṃ sati|| 24

अर्थ

पतिप्राणा देवि! मैं शापसे मुक्त होनेके लिये आपको प्रसन्‍न नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिये क्षमा करें॥ २४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें