श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विद्याधर चित्रकेतु भगवान् शंकर और पार्वतीजीको इस प्रकार प्रसन्न करके उनके सामने ही विमानपर सवार होकर वहाँसे चले गये। इससे उन लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ २५॥
इति प्रसाद्य गिरिशौ चित्रकेतुररिन्दम।
जगाम स्वविमानेन पश्यतोः स्मयतोस्तयोः॥ २५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विद्याधर चित्रकेतु भगवान् शंकर और पार्वतीजीको इस प्रकार प्रसन्न करके उनके सामने ही विमानपर सवार होकर वहाँसे चले गये। इससे उन लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 789) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/25/