श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.28

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

नारायणपराः सर्वे न कुतश्‍चन बिभ्यति।

स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः॥ २८

nārāyaṇaparāḥ sarve na kutaścana bibhyati|

svargāpavarganarakeṣvapi tulyārthadarśinaḥ|| 28

अर्थ

जो लोग भगवान्‌के शरणागत होते हैं, वे किसीसे भी नहीं डरते। क्योंकि उन्हें स्वर्ग, मोक्ष और नरकोंमें भी एक ही वस्तुके—केवल भगवान्‌के ही समानभावसे दर्शन होते हैं॥ २८॥✎ 546 547 548

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #546 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #547 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #548 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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