न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चिन्नाप्रियः स्वः परोऽपि वा।
आत्मत्वात्सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरिः॥ ३३
na hyasyāsti priyaḥ kaścinnāpriyaḥ svaḥ paro'pi vā|
ātmatvātsarvabhūtānāṃ sarvabhūtapriyo hariḥ|| 33
अर्थ
भगवान्को न कोई प्रिय है और न अप्रिय। उनका न कोई अपना है और न पराया। वे सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये सभी प्राणियोंके प्रियतम हैं॥ ३३॥✎ 546547548
न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चिन्नाप्रियः स्वः परोऽपि वा।
आत्मत्वात्सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरिः॥ ३३
भगवान्को न कोई प्रिय है और न अप्रिय। उनका न कोई अपना है और न पराया। वे सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये सभी प्राणियोंके प्रियतम हैं॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 790) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)