श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.34

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

तस्य चायं महाभागश्चित्रकेतुः प्रियोऽनुगः।

सर्वत्र समदृक् शान्तो ह्यहं चैवाच्युतप्रियः॥ ३४

tasya cāyaṃ mahābhāgaścitraketuḥ priyo'nugaḥ|

sarvatra samadṛk śānto hyahaṃ caivācyutapriyaḥ|| 34

अर्थ

प्रिये! यह परम भाग्यवान् चित्रकेतु उन्हींका प्रिय अनुचर, शान्त एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान् श्रीहरिका ही प्रिय हूँ॥ ३४॥✎ 546 547 548

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #546 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #547 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #548 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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