श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.35

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

तस्मान्‍न विस्मयः कार्यः पुरुषेषु महात्मसु।

महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु॥ ३५

tasmānna vismayaḥ kāryaḥ puruṣeṣu mahātmasu|

mahāpuruṣabhakteṣu śānteṣu samadarśiṣu|| 35

अर्थ

इसलिये तुम्हें भगवान्‌के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषोंके सम्बन्धमें किसी प्रकारका आश्‍चर्य नहीं करना चाहिये॥ ३५॥✎ 546 547 548

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #546 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #547 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #548 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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