॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.18.13
संह्रादं प्रागनुह्रादं ह्रादं१ प्रह्रादमेव च।
तत्स्वसा सिंहिका नाम राहुं विप्रचितोऽग्रहीत्॥ १३
saṃhrādaṃ prāganuhrādaṃ hrādaṃ prahrādameva ca|
tatsvasā siṃhikā nāma rāhuṃ vipracito'grahīt|| 13
अर्थ
हिरण्यकशिपुकी पत्नी दानवी कयाधु थी। उसके पिता जम्भने उसका विवाह हिरण्यकशिपुसे कर दिया था। कयाधुके चार पुत्र हुए—संह्राद, अनुह्राद, ह्राद और प्रह्राद। इनकी सिंहिका नामकी एक बहिन भी थी। उसका विवाह विप्रचित्ति नामक दानवसे हुआ। उससे राहु नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई॥ १२-१३॥✎ 550
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—प्रह्लादं ह्लादमेव च।