यह वही राहु है, जिसका सिर अमृतपानके समय मोहिनीरूपधारी भगवान्ने चक्रसे काट लिया था। संह्रादकी पत्नी थी कृति। उससे पंचजन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ १४॥✎ 550
शिरोऽहरद्यस्य हरिश्चक्रेण पिबतोऽमृतम्।
संह्रादस्य कृतिर्भार्यासूत पञ्चजनं ततः॥ १४
यह वही राहु है, जिसका सिर अमृतपानके समय मोहिनीरूपधारी भगवान्ने चक्रसे काट लिया था। संह्रादकी पत्नी थी कृति। उससे पंचजन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 793) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/18/14/