श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.24

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

कदा नु भ्रातृहन्तारमिन्द्रियाराममुल्बणम्।

अक्लिन्‍नहृदयं पापं घातयित्वा शये सुखम्॥ २४

kadā nu bhrātṛhantāramindriyārāmamulbaṇam|

aklinnahṛdayaṃ pāpaṃ ghātayitvā śaye sukham|| 24

अर्थ

‘सचमुच इन्द्र बड़ा विषयी, क्रूर और निर्दयी है। राम! राम! उसने अपने भाइयोंको ही मरवा डाला। वह दिन कब होगा, जब मैं भी उस पापीको मरवाकर आरामसे सोऊँगी॥ २४॥

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